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बंद की राजनीति और सोशल मीडिया
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बंद की राजनीति और सोशल मीडिया

April 14th, 2018 urvashi Goel Articles, Hindi, News, देश, राजनीति 0 comments

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नई दिल्ली/कुमोद कुमार
दलित आंदोलन फिर उसके बाद आरक्षण विरोधी आंदोलन में ये रोज-रोज के भारत बंद आंदोलन कहां से पैदा हो रहे हैं? इसमें शामिल होने वाले लोग कहां से आ रहे हैं।
2 अप्रैल को हुए दलित विरोध प्रदर्शन किसके दिमाग की उपज थी यह कोई नहीं जानता। इन प्रदर्शनों में जो 10 से ज्यादा लोग मारे गए, इसकी जवाबदेही किसकी है? और उस दलित आंदोलन के जवाब में आज जो हिंसात्मक प्रदर्शन हुए, इसके पीछे किसका दिमाग है।2 अप्रैल वाला दलित आंदोलन था और 10 अप्रैल वाला सवर्ण आंदोलन।
दलित आंदोलन की मुख्य वजह थी दलित एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के आए फैसले पर अप्रैल से पहले एक कैंपेन चलाया गया।इस कैंपेन के जरिए देशभर के दलितों को 2 अप्रैल को एकजुट होकर मोदी सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने का आह्वान किया गया। दलित एक्ट में बदलाव के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पुनर्विचार याचिका में हुई देरी को सरकार का दलित विरोधी कदम बताया गया।
फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप के जरिए मैसेज फैलाए गए कि 2 अप्रैल को देशभर के दलित इकट्ठा होकर सरकार के दलित विरोधी रवैये के खिलाफ सड़कों पर उतरेंये आह्वान किसने किया था किसी को नहीं पता।
सरकार के विरोध में बने माहौल का फायदा बीएसपी, एसपी,आरजेडी से लेकर कांग्रेस और भीम आर्मी के दलित संगठन ने जमकर फायदा उठाया।मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा हंगामा हुआ।उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार से झारखंड, पंजाब, हरियाणा से लेकर छत्तीसगढ़ में सड़कों पर काफी उपद्रव देखने को मिले।
जिस तरह से सोशल मीडिया के जरिए 2 अप्रैल के भारत बंद की भूमिका तैयार हुई ठीक उसी तर्ज पर दलित-ओबीसी आरक्षण के खिलाफ भारत बंद का माहौल बन गया। फेसबुक, ट्विटर और व्हॉट्सएप पर मैसेज वायरल हुए।लिखा गया- आरक्षण विरोध में 10 अप्रैल को सवर्ण-ओबीसी समर्थित भारत बंद का समर्थन करें। सोशल मीडिया पर सवर्ण-ओबीसी का गुट कैसे बन गया और ओबीसी आरक्षण का विरोध क्यों करने लगे,ये किसी को समझ नहीं आया।
2 अप्रैल के दलित आंदोलन में हिंसा को रोकने में नाकाम राज्य सरकारों के सामने 10 अप्रैल का सवर्ण आंदोलन नया संकट लेकर खड़ा हो गया।
दलित आंदोलन में चोट खाई सरकारों ने आनन-फानन में बड़ी तैयारियां कर लीं।मध्य प्रदेश में सरकार ने चुस्ती दिखाई।मध्यप्रदेश के भिंड जिले में सोमवार नौ अप्रैल की शाम छह बजे से ही कर्फ्यू लागू कर दिया गया।दस अप्रैल को स्कूल, कॉलेज बंद कर दिए गए।भिंड सहित पूरे ग्वालियर चंबल संभाग में रविवार की रात बारह बजे से ही इंटरनेट की सेवाएं बंद कर दी गईं। राजस्थान में भी कई जगहों पर इंटरनेट सेवाएं रोक दी गईं। हालांकि इन सबके बीच पुलिस प्रशासन के लिए मुश्किल सवाल ये था कि वो एहतियाती कदम तो उठाएं लेकिन नजर किस संगठन पर रखें कि संभावित हिंसा को रोका जा सके। किसी ने इस बंद के ऐलान की जिम्मेदारी नहीं ली थी।
सोशल मीडिया से उपजे दलित विरोध के जवाब देने की जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं था। हालांकि 10 अप्रैल को सारे एहतियाती कदम उठाए जाने के बाद भी कई जगहों से तोड़फोड़ की खबरें आईं. बिहार में आरा, छपरा, दरभंगा, बेगूसराय, गया, नालंदा से हिंसा की खबरें आईं। आरा में दो गुटों ने आमने-सामने आकर फायरिंग की। एसडीओ की गाड़ी जला दी. दरभंगा के ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी में बीए की परीक्षा स्थगित कर दी गई थी। बरौनी, बेगूसराय और नालंदा में प्रदर्शनकारियों ने रेलवे ट्रैक पर आकर ट्रेन को रोक दिया।कई जगहों पर सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन हुए। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में पुलिस-प्रशासन ड्रोन से लगा कर पूरी तरह पैनी नज़र बनाये हुए था।
सरकार इस बार ज्यादा सचेत थी इसलिए इस बार हिंसा कम हुई।इस तरह से अगर सोशल मीडिया से विरोध प्रदर्शन उपजता रहा तो ये आने वाले दिनों में और मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं. सोशल मीडिया के एक पोस्ट से अगर जातीय गोलबंदी हो जाए तो समझा जा सकता है कि ये कितने खतरनाक हो सकता हैं इसलिए सोशल मीडिया पर सरकार को काबू में रखने की जरूरत हैं।सड़कों पर हुए पिछले दो हिंसात्मक विरोध प्रदर्शन ने कुछ बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
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