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महाराष्ट्र चुनाव के बाद किस पार्टी ने क्या खोया,क्या पाया?
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महाराष्ट्र चुनाव के बाद किस पार्टी ने क्या खोया,क्या पाया?

December 1st, 2019 Nitish Pathak Articles 0 comments

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1 दिसंबर’19 नीतीश पाठक

महाराष्ट्र चुनाव के बाद कौन सी पार्टी ने क्या पाया और क्या खोया?


भारतीय जनता पार्टी ने क्या खोया और क्या पाया ?
अपने दम पर बहुमत लाने का दावा करने वाली बीजेपी को पहला झटका तब लगा, जब वो 103 सीट पर ही सिमट कर रह गई. फिर शिवसेना ने झटका दिया जब वो मुख्यमंत्री के लिए अड़ गए और बीजेपी पर वादे से मुकरने का आरोप लगा दिया. फिर अजीत पवार के साथ सरकार बनाने का शो भी प्लॉप हो गया. चलो ठीक है कि सहयोगी ने झटका दे दिया, लेकिन    राजनीति मे जल्दबाजी और गलत आंकलन नहीं करना चाहिए. दूसरा सबक ये कि अपने प्रभारियों और राज्य में अपने नेताओं के आंकलन के अलावा भी अपना सम्पर्क  चारों ओर ठीक से जोड़े रखने चाहिए. यानि जनमानस और राजनीति का मिजाज भांपने के तरीकों में भी बदलाव जरुरी है. जब पार्टी के भीतर भी एक के बाद एक नेता नाराज हो रहे थे और मराठा बनाम गैर मराठा का राग जब शरद पवार ने अलापा, तब भी आलाकमान को चेताने  राज्य से कोई नहीं आया. तीसरा सबक ये कि धारा 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दे रिमोट इलाकों में नहीं चले. शीर्ष सूत्रों ने दावा किया कि कहीं कोई झटका नहीं लगा है और ना ही किसी ने कोई धोखा दिया है. बल्कि ये उम्मीद भी जतायी गयी है कि बातें सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रही है. आलाकमान तमाम घटनाक्रम से वाकिफ है और जल्दी ही तमाम कमियों को दूर कर लिया जायेगा।
 कांग्रेस ने क्या खोया क्या पाया?महाराष्ट्र चुनाव के बाद कौन सी पार्टी ने क्या पाया और क्या खोया?
भारतीय जनता पार्टी ने क्या खोया और क्या पाया ?
अपने दम पर बहुमत लाने का दावा करने वाली बीजेपी को पहला झटका तब लगा, जब वो 103 सीट पर ही सिमट कर रह गई. फिर शिवसेना ने झटका दिया जब वो मुख्यमंत्री के लिए अड़ गए और बीजेपी पर वादे से मुकरने का आरोप लगा दिया. फिर अजीत पवार के साथ सरकार बनाने का शो भी प्लॉप हो गया. चलो ठीक है कि सहयोगी ने झटका दे दिया, लेकिन    राजनीति मे जल्दबाजी और गलत आंकलन नहीं करना चाहिए. दूसरा सबक ये कि अपने प्रभारियों और राज्य में अपने नेताओं के आंकलन के अलावा भी अपना सम्पर्क  चारों ओर ठीक से जोड़े रखने चाहिए. यानि जनमानस और राजनीति का मिजाज भांपने के तरीकों में भी बदलाव जरुरी है. जब पार्टी के भीतर भी एक के बाद एक नेता नाराज हो रहे थे और मराठा बनाम गैर मराठा का राग जब शरद पवार ने अलापा, तब भी आलाकमान को चेताने  राज्य से कोई नहीं आया. तीसरा सबक ये कि धारा 370 और राम मंदिर जैसे मुद्दे रिमोट इलाकों में नहीं चले. शीर्ष सूत्रों ने दावा किया कि कहीं कोई झटका नहीं लगा है और ना ही किसी ने कोई धोखा दिया है. बल्कि ये उम्मीद भी जतायी गयी है कि बातें सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ रही है. आलाकमान तमाम घटनाक्रम से वाकिफ है और जल्दी ही तमाम कमियों को दूर कर लिया जायेगा।
 कांग्रेस ने क्या खोया क्या पाया?


शिवसेना के साथ सरकार बनाने की कवायद शुरु हुई थी तब सोनिया गांधी ने अपने नेताओं को चेताया था कि कोई एडवेंचर ना करें. लेकिन बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने की चाह ने उन्हें अपनी विचारधारा तक से समझौता करने को मजबूर कर दिया. कांग्रेस भूल गयी की शिवसेना ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की है. कांग्रेस ये भूल गयी कि गोड़से को शिवसेना देश भक्त बताती थी. कांग्रेस को ये भी याद नहीं रहा कि शिवसेना 6 दिसंबर को अयोध्या के मसले पर जश्न मनाती है. ये बात और है कि प्रतीभा पाटिल को समर्थन देने के मसले पर हो या फिर कलाम का विरोध करने के मसले पर शिवसेना उनसे मिलकर आगे बढ़ती रही. शिवसेना को उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा के लिए कांग्रेस ने हमेशा निशाने पर रखा है. लेकिन अब कुछ याद नहीं है. शिवसेना अब उन्हें कट्टर नजर नहीं आ रही. समाजवादियों ने तो बीजपी का हाथ थाम कर सेक्युलरिज्म की परिभाषा बदल दी थी. लेकिन अब कांग्रेस ने जो झंडा बुलंद किया है अब तो ये विवाद खड़ा करने के लिए कोई भी पार्टी नहीं बची. साफ ये भी नहीं है कि कांग्रेस अपने तमिलनाडू, केरल और कर्नाटक के वोटरों को क्या सफाई देगी. वैसे भी सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह ने मुंबई ना जाकर ये साफ कर दिया है कि वो मंच साझा नहीं करेंगे. यानि विवाद हुआ तो कम से कम पल्ला झाड़ कर खड़े तो वे हो ही जाएंगे. देखें कब तक शिवसेना खामोश रह पाती है और कांग्रेस के सब्र का बांध कब टूटता है.
एनसीपी- क्या खोया क्या पाया?
कुल मिलाकर शरद पवार एक मजबूत स्तंभ बन कर उभरे हैं. सवाल उठने लगे थे कि शरद पवार के बाद कौन एनसीपी के नेता होंगे. ऐसे में वो किंग मेकर के रूप में उभरे. भतीजे अजित पवार को शांति से पटरी पर लाए. बेटी सुप्रीया सुले को अघोषित उत्तराधिकारी बना दिया. माराठा वोट बैंक वापस खींचा और महाराष्ट्र में सत्ता की चाभी अपने पास रख ली. साथ ही ये भी संदेश दे दिया कि बीजेपी आलाकमान की चालों का तोड़ भी वो जानते हैं. जवाब देना कांग्रेस और शिवसेना को भारी पड़ेगा, लेकिन फिलहाल एनसीपी की तो चल निकली है. लेकिन मुश्किल ये है कि अजित पवार शांति से मान भले ही गए हों, लेकिन मंत्रीमंडल के गठन और हाशिए पर भेजे जाने की स्थिति में कितने शांत रहेंगे ये अभी साफ नहीं है. तभी तो उपमुख्यमंत्री और मंत्रीमंडल का विस्तार रोक दिया है. संकेत हैं कि ये अब सदन में बहुमत परीक्षण के बाद ही होगा. साथ ही उनकी पार्टी के आला नेताओं पर चल रहे भ्रष्टचार के मामलों पर आगे क्या होगा ये भी साफ नहीं है.
शिवसेना- क्या खोया क्या पाया?
शिवसेना ने जिद पकड़ी और महाराष्ट्र की सत्ता तो पा ली. लेकिन इसके लिए उन्हें अपना रंग बदलना पड़ा है. बीजेपी के साथ वो एक ऐजेंडा और एक विचारधारा पर चलते थे. सबसे पुराने सहयोगी भी रहे. लेकिन पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी के बढ़ते असर ने उन्हें चौंकन्ना जरूर कर दिया. उन्हें लग रहा था कि कहीं उनकी राजनीति मुंबई से ठाणे के बीच सिमट ना जाए. ऐसे में राजनीतिक दुश्मनों का हाथ भी थामना पड़ा. कम से कम अपने कोर ऐजेंडा हिदुत्व से उन्हें दूर रहना पड़ेगा. कांग्रेस के साथ बनी कोई भी सरकार देश में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है, ऐसे में उन्हें हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा. बीजेपी अब पूरे राज्य में हिंदुत्व की अकेली पुरोधा बनकर उभरेगी. इसे संभालना शिवसेना के लिए मुश्किल होगा. क्योंकि दोनों का वोट बैंक यही है. कांग्रेस और एनसीपी की पूरी कोशिश रहेगी कि शिवसेना को और बढ़ने ना दे. इसलिए पार्टी का विस्तार चिंता का विषय तो रहेगा ही. कुल मिलाकर इस जंग में वो अकेले ही फंसे नजर आ रहे हैं.
अब सबसे बड़ी बात यह है की क्या ये तीनो पार्टी मिलकर जिनका अलग अलग सोच और विचार धरा है वो 5 सालो का महाराष्ट्र का सत्ता नियमित ढंग से चला पाएंगी।। 
शिवसेना के साथ सरकार बनाने की कवायद शुरु हुई थी तब सोनिया गांधी ने अपने नेताओं को चेताया था कि कोई एडवेंचर ना करें. लेकिन बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने की चाह ने उन्हें अपनी विचारधारा तक से समझौता करने को मजबूर कर दिया. कांग्रेस भूल गयी की शिवसेना ने सावरकर को भारत रत्न देने की मांग की है. कांग्रेस ये भूल गयी कि गोड़से को शिवसेना देश भक्त बताती थी. कांग्रेस को ये भी याद नहीं रहा कि शिवसेना 6 दिसंबर को अयोध्या के मसले पर जश्न मनाती है. ये बात और है कि प्रतीभा पाटिल को समर्थन देने के मसले पर हो या फिर कलाम का विरोध करने के मसले पर शिवसेना उनसे मिलकर आगे बढ़ती रही. शिवसेना को उत्तर भारतीयों के खिलाफ हिंसा के लिए कांग्रेस ने हमेशा निशाने पर रखा है. लेकिन अब कुछ याद नहीं है. शिवसेना अब उन्हें कट्टर नजर नहीं आ रही. समाजवादियों ने तो बीजपी का हाथ थाम कर सेक्युलरिज्म की परिभाषा बदल दी थी. लेकिन अब कांग्रेस ने जो झंडा बुलंद किया है अब तो ये विवाद खड़ा करने के लिए कोई भी पार्टी नहीं बची. साफ ये भी नहीं है कि कांग्रेस अपने तमिलनाडू, केरल और कर्नाटक के वोटरों को क्या सफाई देगी. वैसे भी सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मनमोहन सिंह ने मुंबई ना जाकर ये साफ कर दिया है कि वो मंच साझा नहीं करेंगे. यानि विवाद हुआ तो कम से कम पल्ला झाड़ कर खड़े तो वे हो ही जाएंगे. देखें कब तक शिवसेना खामोश रह पाती है और कांग्रेस के सब्र का बांध कब टूटता है.
एनसीपी- क्या खोया क्या पाया?
कुल मिलाकर शरद पवार एक मजबूत स्तंभ बन कर उभरे हैं. सवाल उठने लगे थे कि शरद पवार के बाद कौन एनसीपी के नेता होंगे. ऐसे में वो किंग मेकर के रूप में उभरे. भतीजे अजित पवार को शांति से पटरी पर लाए. बेटी सुप्रीया सुले को अघोषित उत्तराधिकारी बना दिया. माराठा वोट बैंक वापस खींचा और महाराष्ट्र में सत्ता की चाभी अपने पास रख ली. साथ ही ये भी संदेश दे दिया कि बीजेपी आलाकमान की चालों का तोड़ भी वो जानते हैं. जवाब देना कांग्रेस और शिवसेना को भारी पड़ेगा, लेकिन फिलहाल एनसीपी की तो चल निकली है. लेकिन मुश्किल ये है कि अजित पवार शांति से मान भले ही गए हों, लेकिन मंत्रीमंडल के गठन और हाशिए पर भेजे जाने की स्थिति में कितने शांत रहेंगे ये अभी साफ नहीं है. तभी तो उपमुख्यमंत्री और मंत्रीमंडल का विस्तार रोक दिया है. संकेत हैं कि ये अब सदन में बहुमत परीक्षण के बाद ही होगा. साथ ही उनकी पार्टी के आला नेताओं पर चल रहे भ्रष्टचार के मामलों पर आगे क्या होगा ये भी साफ नहीं है.
शिवसेना- क्या खोया क्या पाया?
शिवसेना ने जिद पकड़ी और महाराष्ट्र की सत्ता तो पा ली. लेकिन इसके लिए उन्हें अपना रंग बदलना पड़ा है. बीजेपी के साथ वो एक ऐजेंडा और एक विचारधारा पर चलते थे. सबसे पुराने सहयोगी भी रहे. लेकिन पूरे महाराष्ट्र में बीजेपी के बढ़ते असर ने उन्हें चौंकन्ना जरूर कर दिया. उन्हें लग रहा था कि कहीं उनकी राजनीति मुंबई से ठाणे के बीच सिमट ना जाए. ऐसे में राजनीतिक दुश्मनों का हाथ भी थामना पड़ा. कम से कम अपने कोर ऐजेंडा हिदुत्व से उन्हें दूर रहना पड़ेगा. कांग्रेस के साथ बनी कोई भी सरकार देश में अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई है, ऐसे में उन्हें हर कदम फूंक-फूंककर रखना होगा. बीजेपी अब पूरे राज्य में हिंदुत्व की अकेली पुरोधा बनकर उभरेगी. इसे संभालना शिवसेना के लिए मुश्किल होगा. क्योंकि दोनों का वोट बैंक यही है. कांग्रेस और एनसीपी की पूरी कोशिश रहेगी कि शिवसेना को और बढ़ने ना दे. इसलिए पार्टी का विस्तार चिंता का विषय तो रहेगा ही. कुल मिलाकर इस जंग में वो अकेले ही फंसे नजर आ रहे हैं.
अब सबसे बड़ी बात यह है की क्या ये तीनो पार्टी मिलकर जिनका अलग अलग सोच और विचार धरा है वो 5 सालो का महाराष्ट्र का सत्ता नियमित ढंग से चला पाएंगी।। 

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