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पिता की प्रॉपर्टी पर जितना बेटे का हक उतना ही बेटी का भी, सुप्रीम कोर्ट ने दिया यह फैसला
पिता की प्रॉपर्टी पर जितना बेटे का हक उतना ही बेटी का भी, सुप्रीम कोर्ट ने दिया यह फैसला
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पिता की प्रॉपर्टी पर जितना बेटे का हक उतना ही बेटी का भी, सुप्रीम कोर्ट ने दिया यह फैसला

January 24th, 2020 Sahil Saini Articles, Hindi, News, देश, राजनीति 0 comments

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24 January 2020, Sahil

बरेली के विधायक मिश्रा की बेटी के बागी होने के बाद कई लोगों के मन में सवाल है कि अब विधायक जी की प्रॉपर्टी पर उसका हक होगा कि नहीं। तो हम आपको बता रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के ऐसे मामलों पर क्या आदेश हैं जोकि कानून हैं।

साल 2005 में संशोधन होने के पहले हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत प्रॉपर्टी में बेटे और बेटियों के अधिकार अलग-अलग हुआ करते थे। इसमें बेटों को पिता की संपत्ति पर पूरा हक दिया जाता था, जबकि बेटियों का सिर्फ शादी होने तक ही इस पर अधिकार रहता था। विवाह के बाद बेटी को पति के परिवार का हिस्सा माना जाता था। हिंदू कानून के मुताबिक हिंदू गैर विभाजित परिवार (एचयूएफ), जिसे जॉइंट फैमिली भी कहा जाता है, सभी लोग एक ही पूर्वज के वंशज होते हैं। एचयूएफ हिंदू, जैन, सिख या बौद्ध को मानने वाले लोग बना सकते हैं।

शादीशुदा बेटियों का अब उनके पिता की संपत्ति पर क्या अधिकार हैं: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 में बेटियों के ये हैं अधिकार-पहले बेटियों की शादी होने के बाद उनका पिता की संपत्ति में कोई हक नहीं रहता था। कई लोगों को यह महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को कुचलने वाला लगा। लेकिन 9 सितंबर 2005 को हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005, जो हिंदुओं के बीच संपत्ति का बंटवारा करता है, में संशोधन कर दिया गया। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 2005 के मुताबिक लड़की चाहे कुंवारी हो या शादीशुदा, वह पिता की संपत्ति में हिस्सेदार मानी जाएगी। इतना ही नहीं उसे पिता की संपत्ति का प्रबंधक भी बनाया जा सकता है। इस संशोधन के तहत बेटियों को वही अधिकार दिए गए, जो पहले बेटों तक सीमित थे। हालांकि बेटियों को इस संशोधन का लाभ तभी मिलेगा, जब उनके पिता का निधन 9 सितंबर 2005 के बाद हुआ हो। इसके अलावा बेटी सहभागीदार तभी बन सकती है, जब पिता और बेटी दोनों 9 सितंबर 2005 को जीवित हों। सुप्रीम कोर्ट ने भी हाल ही में इसको लेकर यही फैसला सुनाया।

सहदायिक को भी समान अधिकार: सहदायिक में सबसे बुजुर्ग सदस्य और परिवार की तीन पीढ़ियां आती हैं। पहले इसमें उदाहरण के तौर पर बेटा, पिता, दादा और परदादा आते थे। लेकिन अब परिवार की महिला भी सहदायिक हो सकती है। सहदायिकी के तहत, सहदायिक का जन्म से सामंती संपत्ति पर अधिकार होता है। सहदायिक का परिवार के सदस्यों के जन्म और मृत्यु के आधार पर सहदायिकी में दिलचस्पी और हिस्सा ऊपर-नीचे होता रहता है। पैतृक और खुद से कमाई हुई प्रॉपर्टी सहदायिक संपत्ति हो सकती है। पैतृक संपत्ति पर सभी लोगों का हिस्सा होता है। जबकि खुद से कमाई हुई संपत्ति में शख्स को यह अधिकार होता है कि वह वसीयत के जरिए प्रॉपर्टी को मैनेज कर सकता है।सहदायिकी का सदस्य किसी थर्ड पार्टी को अपना हिस्सा बेच सकता है। हालांकि इस तरह की बिक्री सहदायिकी के अन्य सदस्यों के अग्रक अधिकारों का विषय है। अन्य सदस्यों को यह अधिकार है कि वे संपत्ति में किसी बाहरी शख्स के प्रवेश को मना कर सकते हैं।-एक सहदायिक (कोई भी सदस्य नहीं) सामंती संपत्ति के बंटवारे के लिए केस फाइल कर सकता है। इसलिए बतौर सहदायिक एक बेटी अब पिता की संपत्ति में बंटवारे की मांग कर सकती है।

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