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क्या है आर्टिकल 44 जिसका हवाला दे दिल्ली हाईकोर्ट ने की समान नागरिक संहिता लाने की वकालत!
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क्या है आर्टिकल 44 जिसका हवाला दे दिल्ली हाईकोर्ट ने की समान नागरिक संहिता लाने की वकालत!

July 10th, 2021 urvashi Goel Articles 0 comments

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Leena Rajput

क्या है आर्टिकल 44 जिसका हवाला दे दिल्ली हाईकोर्ट ने की समान नागरिक संहिता लाने की वकालत!
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक केस की सुनवाई के दौरान देश भर में समान नागरिक संहिता लागू करने की वकालत की !उसने कहा है कि अब समाज में धर्म जाति और समुदाय की पारंपरिक रूढ़ियां टूट रहे हैं इसलिए समय आ गया है कि संविधान की धारा 354 के आलोक में समान नागरिक संहिता की तरफ कदम बढ़ाया जाए! हाईकोर्ट ने 95 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जारी एक निर्देश का हवाला देते हुए निराशा जताते हुए कहा था कि तीन दशक बाद भी इसे गंभीरता से नहीं लिया गया है! हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस एस ए बोबडे ने भी गोवा की यूनिफॉर्म सिविल कोड की तारीफ की थी! सीजीआई गोवा में हाई कोर्ट बिल्डिंग के उद्घाटन के मौके पर चीफ जस्टिस ने कहा था कि गोवा के पास पहले से भी ऐसे यूनिफॉर्म सिविल कोड है जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी! आइए चलिए जानते हैं आर्टिकल 44 में ऐसा क्या है और हाईकोर्ट ने उसके बारे में क्या कहा!


संविधान के भाग 4 में राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांत का वर्णन है! संविधान के अनुच्छेद 36 -51 के जरिए राज्य को विभिन्न महत्वपूर्ण मुद्दों पर सुझाव दिए गए हैं! और उम्मीद की गई है कि राज्य अपनी नीतियां तय करते हुए इन निर्देशक तत्वों पर ध्यान देंगे इन्हीं में आर्टिकल 44 राज्य को उचित समय आने पर सभी धर्मों के लिए समान नागरिक संहिता बनाने का निर्देश देता है! कुल मिलाकर आर्टिकल का उद्देश्य कमजोर वर्गों से भेदभाव की समस्या को खत्म करके देश भर में विभिन्न सांस्कृतिक समुदाय के बीच तालमेल बढ़ाना है!

संविधान सभा में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने संविधान निर्माण के वक्त कहा था कि समान नागरिक संहिता अपेक्षित है! लेकिन फिलहाल इसे विभिन्न धर्मा के लोगों की इच्छा पर छोड़ देना चाहिए! इस तरह संविधान के आर्टिकल 35 को अंकित संविधान के आर्टिकल 44 के रूप में शामिल कर दिया गया और उम्मीद की गई है कि राष्ट्रीय एकमत हो जाएगा तो समान नागरिक संहिता अस्तित्व में आ जाएगा! संविधान सभा में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने एक भाषण में कहा था कि किसी को यह नहीं मानना चाहिए कि अगर राज्य के पास शक्ति है तो वे इसे तुरंत ही लागू कर देगा संभव है कि मुसलमान और ईसाई या कोई अन्य समुदाय राज्य को इस संदर्भ में दी गई शक्तियों को आपत्तिजनक मान सकते हैं मुझे लगता है कि ऐसा करने वाली कोई पागल सरकार ही होगी! इस बात से पता चलता है! कि हमारा संविधान निर्माताओं ने समान नागरिक संहिता को भले ही तत्काल लागू नहीं किया था! लेकिन धारा 44 के जरिए इसकी कल्पना जरूर की थी वह चाहते थे कि सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों के लिए एक जैसा पर्सनल लॉ हो! इसलिए उन्होंने नीति निदेशक सिद्धांत के तहत अपनी भावना का इजहार कर दिया! इस आर्टिकल के जरिए संविधान निर्माताओं ने साफ कहा है कि राज्य इस बात का प्रयास करेगा कि सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता बने जिसे पूरे देश में लागू हो! इसी उम्मीद में उन्होंने उस वक्त अलग-अलग धर्मों के लिए अलग-अलग पर्सनल लॉ बनाने का समर्थन किया था! अब संबंधित धर्म के लोगों के मुताबिक ही उसके मानने वालों में शादी तलाक गुजारा भत्ता गोद लेने की प्रक्रिया विरासत से जुड़े अधिकार आदि तय होते हैं !

जिस दिन इस देश में समान नागरिक संहिता लागू हो जाएगी उसी दिन से शादी से विरासत से जुड़े मामलों में भी सभी धर्म और समुदाय के लिए समान कानून लागू हो जाएगा! केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से ही यूनिफॉर्म सिविल कोड की चर्चा जोर पकड़ गई सरकार ने 2019 में जब जम्मू कश्मीर के लिए विशेष प्रावधान करने वाली संविधान की धारा 370 को खत्म कर दिया तो समान नागरिक संहिता लागू किए जाने की उम्मीद ही बढ़ गई है! बीजेपी अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण करने जम्मू कश्मीर में आर्टिकल 370 को हटाने और देश में समान नागरिक संहिता लागू करने को दर्शकों से अपने एजेंडे में शामिल करती आई है! क्योंकि आर्टिकल 370 हटाने के बाद राम मंदिर निर्माण का एजेंडा भी पूरा होने जा रहा है! तो आम जनता मानकर चल रही है! कि बीजेपी सरकार जल्द ही समान नागरिक संहिता का एजेंडा भी पूरा कर देगी सर्वोच्च न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय तक के समर्थन में आवाज उठ रही है तो केंद्र की मौजूद सरकार का हौसले पर भी जरूर असर हो रहा होगा!

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