नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एतिहासिक फैसला सुनाते हुए निजता को मौलिक अधिकार में शामिल करने का फैसला कर लिया है. मुख्य न्यायाधीश जे एस खेहर की अध्यक्षता में 9 जजों वाली बेंच ने फैसला सुनाया. केंद्र सरकार के लिए यह एक झटका है। इससे पहले केंद्र सरकार ने निजता को मौलिक अधिकार होने से इनकार किया था।

अदालत के फैसले के बाद अब आधार स्कीम के नाम पर होने वाली निजता के उल्लंघन को चुनौती दी जा सकती है। इस फैसले से व्हाट्सएप की नई प्राइवेसी पालिसी को भी चुनौती मिल सकेगी। 23 सितंबर 2016 के दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक केंद्र इस पर अपनी पॉलिसी लागू कर सकता है, लेकिन 25 सितंबर 2016 तक एकत्रित हुए डाटा को फेसबुक या अन्य कंपनियों को शेयर नहीं कर सकता। याचिका कर्तांओं का कहना था कि राइट टू प्राइवेसी एक जन्म जात औऱ कभी ना छीने जाने वाला मौलिक अधिकार है। याचिका में यह भी कहा गया कि आजादी के अधिकार में निजता का अधिकार भी शामिल है, यह एक नेचुरल राइट है जिस बात की गवाही संविधान भी करता है इसके साथ देशवासियों को गारंटी भी मिलती है कि देश में उनके अधिकारों पर अतिक्रमण ना हो। याचिका कर्ताओं के समूह ने प्राइवेसी के अतिक्रमण के तौर पर आधार कार्ड को अनिवार्य बनाने की भी चुनौती दी थी। साथ ही डाटा उल्लंघन पर भी अपनी चिंता जाहिर की थी।
केंद्र सरकार प्राइवेसी को अज्ञात और अव्यवस्थित अधिकार बता चुका है, जिससे गरीबों को जीवन जीने के अधिकार राइट टू फूड्स, राइट टू शेल्टर से वंचित करने वाला बताया था। बता दें कि पहले सुनवाई में देश के अटॉर्नी जनरल ने राइट टू प्राइवेसी को मौलिक अधिकार में लाने से इनकार कर दिया था। उल्लेखनीय है कि 10000 लोगों के सर्वे में निजता के मामले पर चिंता जाहिर की गई थी। साथ ही यह भी कहा था कि उनकी निजता सुरक्षित रखी जानी चाहिए और एक ऐसे कानून की जरूरत है जो इसकी निगरानी रख सके।







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