नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू ने कहा है कि राष्ट्रीय हित के लिए राजनीतिक जनतंत्र पवित्र साधन है और किसी संसदीय जनतंत्र के किसी भी सदन में गड़बड़ी की राजनीति फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।पद की शपथ लेने के बाद शुक्रवारको राज्य सभा के सभापति के रूप में एम. वेंकैया नायडू ने भाषण दिया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक चुनाव में विजेता को जनादेश दिया जाता है और विपक्ष को जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। संसदीय लोकतंत्र संख्या के बारे में है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मात्र संख्या के खेल के लिए हमारे सदनों के कामकाज को कम किया जाए। सरकार गठन के साथ ही संख्याओं का खेल समाप्त हो जाना चाहिए और उसके बाद केवल दुर्लभ मामलों में ही इसका उपयोग किया जाना चाहिए। हमारे जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था की विधायिका का कामकाज भविष्य प्रेरित होने चाहिए।

The Prime Minister, Shri Narendra Modi at the swearing-in ceremony of Shri M. Venkaiah Naidu as the 13th Vice-President of India, at Rashtrapati Bhavan,
उपराष्ट्रपति नायडू ने कहा कि हमें अपनी विविधता और एकता पर गर्व है, तो इस मामले में भी क्या हम एक समान राष्ट्रीय लक्ष्यों को हासिल करने और युवा भारत की आकांक्षाओं को समझने के लिए एकजुट नहीं हो सकते? हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में विभिन्न सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर अलग-अलग विचार रखने और व्यापक विचार-विमर्श की संभावना है। लेकिन संसद की कार्यवाही को बुरी तरह से प्रभावित करने की विपरीत राजनीति की अनुमति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इससे हमारे राष्ट्र की प्रगति प्रभावित होती है। राष्ट्रीय हित के लिए राजनीतिक जनतंत्र पवित्र साधन है, लेकिन सदनों में गूंजने वाली गड़बड़ी की राजनीति हमारे देश और लोगों की प्रगति में बाधा डालती है। हमारे संसदीय जनतंत्र के किसी भी सदन में ऐसी गड़बड़ी की राजनीति फैलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
प्रत्येक चुनाव में विजेता को जनादेश दिया जाता है और विपक्ष को जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। संसदीय लोकतंत्र संख्या के बारे में है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि मात्र संख्या के खेल के लिए हमारे सदनों के कामकाज को कम किया जाए। सरकार गठन के साथ ही संख्याओं का खेल समाप्त हो जाना चाहिए और उसके बाद केवल दुर्लभ मामलों में ही इसका उपयोग किया जाना चाहिए। हमारे जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था की विधायिका का कामकाज भविष्य प्रेरित होने चाहिए। हमारे देश की जनता की यह इच्छा है कि संसद प्रबुद्धजनों की आवाज़ होनी चाहिए, जो लोगों की चिंताओं की आवाज से गूंजती रहे और उनकी समस्याओं का समाधान निकालती रहे, क्योंकि यही सबसे अच्छा तरीका है। वर्षों से संसद के दोनों सदनों ने बहुत अच्छा काम किया है। लेकिन किसी कारण से हमारे कामकाज के बारे में लोगों में चिंता और असंतोष बढ़ा है। इस बढ़ते हुए असंतोष के बारे में गंभीरता से आत्मविश्लेषण करने की आवश्यकता है। लोगों से यह कहा जाए कि हमने अभी तक इस बारे में पर्याप्त कार्य नहीं किया है। हमें अपने बोलने के तरीके और कार्य में उचित बदलाव करके राज्य विधानसभाओं के लिए एक उदाहरण स्थापित करने की आवश्यकता है।
सदन का प्रभावी कामकाज समय और स्थान के प्रबंधन के बारे में है। सत्ता और विपक्षी दोनों बेंचों में स्थान और समय-सीमा निर्धारित है। हमें बेहतर परिणामों के हित में अपने आपको समय और स्थान की इन निर्धारित सीमाओं के भीतर ही समायोजित करने की जरूरत है। दोनों पक्षों की ओर से आपसी तालमेल के रवैये को अपनाने की जरूरत है। ऐसा सदन में अवरोध पैदा करने की बजाए प्रभावी कामकाज की रणनीति के माध्यम से ही संभव है। इसके लिए सभी संबंधित पक्षों की ओर से एक प्रबुद्ध दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
दुर्भाग्य से, पूरे देश भर में हमारी विधानसभाओं में इस अवरोध और रुकावट की कार्यवाही को ही एक मात्र संसदीय विकल्प के रूप में चुनने के काम में बढ़ोत्तरी हुई है। इससे हमारे संसदीय लोकतंत्र पर गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं। इस विकल्प को हमारी जनता के सामने आ रही समस्याओं के समाधान खोजने और मुद्दों को सुलझाने के लिए प्रभावी बहस और चर्चा की चाहत के द्वारा तुरंत हटाने की जरूरत है। हम यह कैसे कर सकते हैं? हमें इस महान सदन के सदस्य होने के अवसर का अच्छा उपयोग करने के लिए कुछ विशेष काम करने की ज़रूरत नहीं है। हमें जो काम करना है, वह अलग तरह से करना है और इस काम के लिए सदन में व्यवधान और अवरोध पैदा करने की बजाए मुद्दों पर जोरदार बहस और चर्चा करने की जरूरत है। मेरा विपक्ष में बहुत दृढ़ विश्वास है और वर्तमान सरकार का अपना तरीका है। इसका अनिवार्य रूप से यह मतलब है कि दोनों ही पक्ष इस प्रक्रिया में एक-दूसरे का सम्मान करें और समायोजन करें।







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