Parth Singh
९/११ वो तारीख जिस दिन अल कायदा द्वारा संचालित हमले ने पूरे अमेरिका की नींद उड़ा दी थी, अमेरिका जैसे महाशक्ति पर हुए इस हमले अमेरिकी सुरक्षा अधिकारियों के होश उड़ा दिए थे,इस हमले के बाद ही अमेरिका सहित नाटो देश के सैनिकों ने पूरे दुनिया भर में ओसामा बिन लादेन को खोज कर निकालने का अभियान शुरू कर दिया।
इसी बीच अमेरिकी खुफिया विभाग को पता चला कि बिन लादेन तालिबान के संरक्षण में है, उसी समय अमेरिका ने अगानिस्तान पर हमला कर तालिबान को सत्ता से उखाड़ फेकने के साथ साथ उसपे प्रतिबंध लगा दिया, उस समय से लेके आज तक अमेरिका और तालिबान में गतिरोध जारी है,
लेकिन हाल ही में हुए तालिबान और अमेरिकी अधिकारियों के बीच हुए शांति वार्ता ने इस तल्खी को कुछ हद तक कम जरूर किया है।
अफानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की घर वापसी के साथ साथ ही तालिबान फिर से अफगानिस्तान में अपनी जड़े मजबूत करने में लग गया है, इसका ताजा उदाहरण कुछ दिन पहले देखने को मिला जब खबर आई कि तालिबानी लड़ाकों ने नौ नए जिलों पे कब्जा जमाया है।
ऐसे में सवाल ये है कि अफानिस्तान में रह रहे प्रवासी और वहा के मूल निवासियों का क्या होगा, क्या फिर से तालिबान अपने रूढ़िवादी विचारो को पूरे अफ़गानिस्तान पर थोप पाने में सफल हो पाएगा? तालिबान के नेता रूढ़िवादी तथा कट्टर इस्लामिक समर्थक है ऐसे में अगर तालिबान वहा सत्ता में आती है तो वहा पे लड़कियों तथा औरतों के लिए हालात मुश्किल हो जायेगे।
अमेरिकी सेना के अफानिस्तान से पलायन करने को लेकर बहुत सारे लोगों का मानना है कि इसके बाद अफ़ग़ानिस्तान गृह युद्ध के चपेट में आ सकता है, एक तरफ जहा अफगान सरकार है वहीं दूसरे तरफ तालिबानी लड़ाके।
इस पूरे मामले में ये देखना दिलचस्प होगा कि भारतीय सरकार और विदेश मंत्रालय इस हालत में क्या कदम उठाती है और अफगानिस्तान में रह रहे भारतीय लोगो की सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित करती है।







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