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आखिर क्या है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’??
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आखिर क्या है फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म ‘हम देखेंगे’??

January 3rd, 2020 Aditi Priya Singh Articles, Breaking News, Hindi, देश, राजनीति 0 comments

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3 january2020,Aditi Priya

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म’ हम देखेंगे ‘जब लिखी गई तब इतनी नहीं पढ़ी गई जितनी अब पढ़ी जा रही है।
फैज़ की गिनती उन शायरों में होती है जिन्होंने पाकिस्तान की हुकूमत के खिलाफ हल्ला बोला था। आज की पीढ़ी भले ही उनसे इतना वाकिफ ना हो लेकिन कविता ,शायरी के जानने वालों से लेकर सोशल मीडिया के गलियों तक में उनके शेर हमेशा जिंदा रहते हैं।
पाकिस्तान जब भारत से अलग हुआ तो वहां पर राजनीतिक उथल-पुथल मची हुई थी लिहाजा लियाकत अली खान खान पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने लेकिन कुछ ही समय के बाद उनके खिलाफ साजिश शुरू हो गई। 1951 में तख्तापलट की साजिश का खुलासा हुआ तो काफी नेताओं ,पत्रकारों की गिरफ्तारी हुई जिनमें फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ भी शामिल थे जिन पर आरोप था कि वे कुछ लोगों के साथ मिलकर पाकिस्तान में वाम दलों की सरकार लाना चाहते हैं। 1951 में गिरफ्तार किए गए फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ को 4 साल जेल में रखा गया। 1955 में वह बाहर आए हालांकि उनका लेखन जारी रहा और उन्होंने हर आरोपों को झूठा करार दिया और इसी कारण उन्हें देश से निकाल दिया गया। कई साल उन्होंने लंदन में बिताए और करीब 8 साल के बाद वह पाकिस्तान लौटे। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के साथ जुल्फिकार अली भुट्टो के अच्छे संबंध थे जब वह विदेश मंत्री बने तो उन्हें वापस लाया गया।
जब 1977 में तत्कालीन आर्मी चीफ जिया-उल-हक ने वहां तख्तापलट किया तो फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ काफी दुखी हुए। इसी दौरान उन्होंने ‘हम देखेंगे’ नज़्म लिखे जो जिया-उल-हक के खिलाफ थे।
इसी नज़्म के कुछ पंक्तियों को लेकर आईआईटी (IIT)कानपुर ने जांच बैठाने की बात कही है आरोप लगाया गया है कि फैज़ की यह पंक्तियां हिंदू विरोधी है।
यह पंक्तियां कुछ इस प्रकार है:-
हम देखेंगे
लाजिम है कि हम भी देखेंगे।
वो दिन कि जिसका वादा है ,
जो लौह-ए-अजल में लिखा है।

जब जुल्म ओ सितम कोह-ए- गिरा,
रुई की तरह उड़ जाएंगे।
हम महाकूमो के पांव तले,
जब धरती धड़ धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हकम सर ऊपर,
जब बिजली कड़ कड़ कड़केगी।

जब अरज-ए-खुदा के कावे से,
सब बुत उठवाए जाएंगे।
हम अहल-ए-सफा मरदूद-ए-हरम,
मसनद पर बिठाए जाएंगे।

सब ताज उछाले जाएंगे,
सब तख्त गिराए जाएंगे,
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो गायब भी है हाजिर भी,
जो मंजर भी है नाजिर भी,

उठेगा अनल हक का नारा,
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी खल्क-ए- खुदा,
जो मैं भी हूं और तुम भी हो।

अब देखना यह है कि इस नज़्म को लेकर कितने बयान आते हैं और किसका क्या मत है।

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Aditi Priya Singh

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