18नवंबर 2019 कौशलेंद्र राज शुक्ला
बिहार की एक तस्वीर ने सच में रुला दिया। इतना रुलाया कि आंसू पलकों से उतरें, इससे पहले ही रास्ते में कहीं सूख गए! नेपथ्य में गूंज रही थी महान गणितज्ञ की वो चुनौती जो उसने आइंस्टीन को दी थी। वो गूंज हर किसी ने सुनी। सरकारों ने भी। लेकिन, सरकारों ने उस गूंज के संगीत को समझने की तनिक भी कोशिश नहीं की!
अस्पताल के बाहर स्ट्रेचर पर इंतज़ार करती मिट्टी आज हुक्मरानों से सिर्फ़ एक ही सवाल पूछ रही थी। यह सवाल था – ‘ऐ सरकार, इस मिट्टी को वतन की सरजमीं की मिट्टी में मिलने को और कितने जतन करने पड़ेंगे?’
‘और कितना इंतज़ार करूं मैं?’
मिट्टी सवाल कर रही थी और जवाब वज़ीर-ए-आज़म के पास नहीं था। उनके पास अगर कुछ भी देने को था तो वह थी ऐसी ‘सरकारी संवेदना’ जो मासिक तनख़्वाह पर लगे किसी प्यादे के ज़रिए दुनिया तक पहुंचाई जा सके। जनाब ने किया भी मात्र इतना ही!
उस महान गणितज्ञ में बस एक ही कमी थी। वह महान आत्मा कभी ‘सियासत की गणित’ में फिट नहीं बैठी।
मीडिया ने उस महान वैज्ञानिक की मानसिक बीमारी का ज़िक्र तो किया है लेकिन इसी मीडिया ने एक जगह भी सरकार के अपाहिज हो चुके जेहन का ज़िक्र नहीं किया! चेतनाशून्य सरकारों को जब ख़बरनवीस ही नहीं झकझोर सके तो फिर हमारी और आपकी तो बिसात ही क्या है!







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