देश भर में दिवाली के बाद आज (22 अक्टूबर) को गोवर्धन पूजा धूमधाम से मनाई जा रही हैं। गोवर्धन पूजा के दिन गोवर्धन पर्वत के रूप में श्री कृष्ण की पूजा की जाती हैं। गोवर्धन पर्वत को हमारे हिन्दुओं में गिरिराज जी का स्वरूप बताया गया है और दोनों ही एक दूसरे का नाम धारण करते हैं।
दिवाली के तुरंत बाद गोवर्धन पूजा क्यों मनाई जाती हैं

दिवाली के बाद गोवर्धन पूजा का त्यौहार इसलिए मनाया जाता हैं कि इस दिन श्रद्धालु अपने घर में गाय के गोबर से गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बनाते हैं फिर उसकी पूजा अर्चना करते हैं।

गोवर्धन पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि हमेशा बनी रहती है साथ ही भगवान श्रीकृष्ण की कृपा होती हैं। यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण द्वारा किए गए उस दिव्य कार्य को याद दिलाता है, जिस दिन कृष्ण भगवान ने इंद्रदेव का घमंड तोड़ा था और उसके प्रकोप से ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगुली पर उठा लिया था।
गोवर्धन पूजा के दिन क्यों चढ़ाते हैं 56 भोग

भगवान श्रीकृष्ण को गोवर्धन पूजा के दिन 56 भोग चढ़ाने की बहुत पुरानी परम्परा हैं ऐसा माना जाता हैं कि जब भगवान ने गोवर्धन पर्वत को उठाया था तब उन्होंने लगातार 7 दिन तक व्रजवासियों की रक्षा की थी उसी दौरान उन्होंने व्रत भी रखा था न अन्न न जल कुछ नहीं ग्रहण किया था। माता यशोदा अपने बाल कृष्ण को दिन में आठ पहर भोजन कराती थीं। जब सात दिन बाद इंद्र का क्रोध शांत हुआ, तो ब्रजवासियों और माता यशोदा को यह चिंता हुई कि कृष्ण सात दिनों तक भूखे रहे थे। इसलिए उनके सात दिनों के भोजन की भरपाई करने के लिए 56 भोग लगाए जाते हैं तभी से यह परम्परा चली आई है।
गोवर्धन महाराज की कथा

हिंदू परम्परा के अनुसार एक बार पुलस्त्य ऋषि तीर्थ यात्रा करते हुए गोवर्धन पर्वत के पास पहुंच गए थे तब उसकी मनोरम छवि को देखकर अभिभूत हो गये इसके बाद उन्होंने उसे अपने साथ ले जाने की ठान ली थी फिर वे गोवर्धन पर्वत के पिता द्रोणांचल पर्वत के पास पहुंचे और उनसे गोवर्धन पर्वत को अपने साथ ले जानी की स्वीकृति मांगी थी।
यह सुनते हुए द्रोणांचल पर्व दुखी हो गये थे लेकिन गोवर्धन महाराज ने उन्हें इसके लिए मना लिया था गोवर्धन महाराज पुलस्त्य ऋषि के साथ चलने को तैयार तो हो गये लेकिन उन्होंने एक शर्त लगा दी कि आप जहां रास्ते में उन्हें रख देंगे वो वहीं जम जाएंगे. पुलस्त्य ऋषि इस पर राजी हो गये और उन्हें अपनी हथेली पर रखकर चल दिये थे

जब वह ब्रजमंडल से गुजर रहे थे तो गोवर्धन को ध्यान आया कि भगवान विष्णु के पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण अधर्म का नाश करने के लिए शीघ्र ही इसी पावन धरती पर अवतार लेने वाले हैं, और अगर वो वहीं जम जाएं तो उन्हें मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी. ऐसा सोचते ही उन्होंने अपना वजन बढ़ा लिया. जिसके बाद पुलस्त्य ऋषि को थकान हुई और उन्होंने वहीं ब्रजभूमि में गोवर्धन पर्वत को जमीन पर रख दिया और आराम करने लगे थे।

आराम करके जब पुलस्त्य ऋषि ने गोवर्धन को चलने को कहा तो उन्होने अपनी शर्ते दोहरा दी इसके बाद पुलस्त्य ऋषि से नाराज होकर उन्हें श्राप दिया कि मुट्ठी भर घटते रहेंगे और एक दिन पूरी तरह से पृथ्वी में समा जाएंगे। तब से आज तक गोवर्धन महाराज ब्रज भूमि पर विराजमान हैं और प्रतिदिन उनका क्षरण हो रहा है।
Shivam Singh
BJMC 3







Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.