उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के नवाबी जायजे लेकर UNESCO में शामिल होने में जगह बना ली है यूनस्को यह एक विशिष्ट खाद्य पदार्थ के बजाय एक सम्मान है लखनऊ के खान-पान को अब वैश्विक पहचान मिल गई है.नवाबी व्यंजनों के लिए मशहूर लखनऊ को UNESCO (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) के क्रिएटिव सिटीज नेटवर्क (CCN) में ‘गैस्ट्रोनॉमी’ (खान-पान/पाक कला) श्रेणी के तहत शामिल किया गया है

यह एक ऐसा सम्मान है। जो किसी शहर की पाककला विरासत, नवाचार और स्थायित्व को पहचानता है। यह सम्मान पाककला विरासत को संजोए रखने के लिए दिया गया हैं। यह उपलब्धि न केवल लखनऊ के लिए गर्व की बात है, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और स्वाद की समृद्ध परंपरा का भी उत्सव माना गया है।
लखनऊ का स्वाद ही कुछ ऐसा है जिसे सुन कर मुंह में पानी आ जाता

लखनऊ के खाने का जिक्र जब भी आता है तो सबसे पहले ज़ुबान पर कवाब, बिरयानी, निहारी, चाट, कुल्फी, कचौड़ी, रेवड़ी और मक्खन मलाई का स्वाद ताजा हो उठता है। यहां आने वाला कोई भी मेहमान टुंडे के कवाब चखे बिना नहीं जाता।1905 में हाजी मुराद अली द्वारा स्थापित यह दुकान आज भी लखनवी स्वाद का प्रतीक बनी हुई है। चौक से लेकर अमीनाबाद तक रूमाली रोटी की अपनी अलग पहचान है।

1925 में शुरू हुई रहीम की कुलचा-निहारी की दुकान आज भी वही पुराना जायका पेश कर रही है। वहीं, इदरीस और वाहिद की बिरयानी पूरे देश में मशहूर है। शीरमाल, रत्ती लाल के खस्ते और प्रकाश की कुल्फी तो लखनवी खानपान की पहचान बन चुके हैं।
अगर हम आपको लखनऊ का हजरतगंज

अगर हम आपको लखनऊ के हजरतगंज का बताए तो उसकी बात ही कुछ अलग है लखनऊ के हजरतगंज में स्थित शर्मा की चाय किसी पहचान की मोहताज नहीं है। यहां अक्सर भीड़ लगी रहती है। स्वाद ऐसा होता है कि एक बार चाय पीने के बाद आप खुद यहां दोबारा पहुंच जाएंगे। हजरतगंज में एक चाट की दुकान भी हैं खूब मशहूर है बहुत ही स्वादिष्ट इन दोनों दुकानों पर नेताओं का हमेशा लगा रहता जमावड़ा।
Shivam Singh
BJMC 3







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